Personality- पत्रकारिता और साहित्य जगत के प्रेरणा स्रोत राम सागर शुक्ल

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दीपाली सिंह 

लखनऊ। जो लोग ज़िन्दगी को ज़िदादिली के साथ जीते हैं और उम्र के ढलान पर भी लगातार क्रियाशील रहते हैं, उनके लिए उम्र महज आंकड़ों का खेल हैं। आज पर्सनेलिटी में हम आपका परिचय एक ऐसे ही व्यक्तित्व से कराने जा रहे हैं, जो 77 वर्ष की आयु में भी जोश और जूनुन के साथ स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन के कार्य को अंजाम दे रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारतीय सूचना सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी राम सागर शुक्ल की, जिन्हें आज मीडिया जगत पितामह के रूप में देखता है। ज्ञान और अनुभव का खजाना समेटे हुए श्री शुक्ल पत्रकारिता और साहित्य जगत के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। अत्यन्त सरल, सौम्य एवं मिलनसार स्वभाव के श्री शुक्ल जहां समाचार से जुड़े कार्यों में सदैव अपने जूनियर्स का मार्गदर्शन करते हैं, वहीं अपनी नई-नई रचनाओं के माध्यम से साहित्य जगत को भी अलंकृत करते रहते हैं।   

जीवन परिचय

राम सागर शुक्ल ने एम.ए.संस्कृत, एल.एल.बी. (इलाहाबाद विवि) के साथ पत्रकारिता एवं जनसंचार में पोस्ट ग्रेजुएट उपाधि ( भारतीय जनसंचार संस्थान, IIMC नई दिल्ली) से प्राप्त की है। उन्होंने भारतीय सूचना सेवा के अन्तर्गत काठमांडू नेपाल में प्रसार भारती के विशेष संवाददाता के रूप में काम करने के साथ ही भारत में विभिन्न पदों पर कार्य किया। लखनऊ में आकाशवाणी और दूरदर्शन के क्षेत्रीय समाचार एकांश में उन्होंने शीर्ष पदों को सुशोभित किया।

शुक्ल जी की रचनाएं

श्री शुक्ल की रूचि हमेशा से भारतीय हिंदू संस्कृति और समसामयिक विषयों पर शोध करने और लिखने में रही, जिसे उन्होंने आज भी जीवित रखा है। उनकी अनेकों रचनाएं अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें- नहीं यह सच नहीं’ (कविता संग्रह) 2002 में, भारत-नेपाल संबंधों पर लिखी गई पहली पुस्तक- ‘अनजान पड़ोसी-भारत-नेपाल’ 2003 में प्रकाशित हुई। इसके अलावा उन्होंने तुलसीदासकृत रामचरित मानस का सम्पादन किया और मानस के प्रक्षिप्त अंशों को चिन्हित करके विशुद्ध रामचरित मानस का प्रकाशन कराया। श्री शुक्ल द्वारा लिखित रेडियो-टीवी समाचार कैसे लिखें’, पुस्तक को भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा भारतेंदु सम्मान से पुरस्कृत किया गया। वहीं उनकी लिखित एक अन्य पुस्तक रेडियो समाचार’ भी इस क्षेत्र में कार्य करने वालों का बेहतर मार्गदर्शन करती है।

कभी न थकने और रूकने वाले श्री शुक्ल साहित्य और पत्रकारिता जगत की सतत् सेवा करते रहते हैं। रामचरितमानस के सुदंरकाण्ड का अंग्रेजी में उनके द्वारा किया अनुवादHANUMAN- THE VICTOR AND THE BENEVOLENT’ 2013 में प्रकाशित हुआ, जिसे पाठकों ने काफी पसंद किया। इसके बाद उन्होंने श्री राम वन गमन मार्ग, भोजपुरी शब्द संग्रह- रचनाधी, रामचरितमानस का अंग्रेजी अनुवाद भी किया। पिछले वर्ष उनकी लिखित पुस्तक कालाधन कथाको उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित किया, जिसमें उन्होंने अपनी लेखनी से भ्रष्टाचार और कालेधन पर विस्तार से प्रकाश डाला है, जिसे लोगों ने काफी सराहा।

लगभग डेढ दशक के प्रयास के बाद श्री राम वन गमन मार्ग के बारे में शोध पर अधारित उनकी पुस्तक वन चले राम रघुराईपाठकों के बीच आ चुकी है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति विशेष पर दक्षिण एशिया के बारे में उनके 100 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान

हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में मौलिक लेखन के लिए भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा वर्ष 2003 में श्री शुक्ल को भारतेंदु पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में प्रशंसनीय योगदान के लिए नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया द्वारा वर्ष 2002 में नागरी भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया।

अन्य उपलब्धियां

श्री शुक्ल ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के बारे में सम्मेलन का आयोजन एवं अभियान का संचालन भी किया। देवरिया जिले के पोस्ट तरकुला ग्राम- मठियारत्ती में उन्होंने तुलसी स्मारक का निर्माण कराया। वह प्रत्येक वर्ष तुलसीदास की जयंती पर विचार गोष्ठियों का आयोजन करवाते हैं। वह रामचरित मानस के रचियता गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि और भारतीय योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि के जन्मस्थान के विकास कार्य में सहयोग भी कर रहे हैं।

साहित्य और पत्रकारिता की सेवा करने के साथ ही साथ राम सागर शुक्ल ने अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी बखूबी निर्वाहन किया। आज उनके पुत्र और पुत्री वरिष्ठ पदों पर कार्य करते हुए सरकार और समाज की सेवा कर रहे हैं।    

राम सागर शुक्ल साहित्यिक गतिविधियों और अपनी रचनात्मक सक्रियता के कारण बौद्धिक समुदाय में एक चर्चित नाम हैं। श्री शुक्ल आज हिंदी साहित्य और पत्रकारिता से जुड़ी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं और उनके कभी न थकने और रूकने वाले जोश को हम सलाम करते हैं।