Newsi7 Special- लोकतंत्र में दलिताें का शाेषण विकास की राह में रोड़ा

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पराग  कमठान (सम्पादक)

लखनऊ। देश में बार-बार वही गलतियां क्यों दोहराई जाती हैं जो हमारे पूर्वजाें ने की। मेरा इशारा आजाद भारत के उस दबे कुचले वर्ग की ओर है जिस पर हर काेई अपना हुक्म चलाना चाहता है। जातिवाद और छुआछूत के आडंबर से निकलना ही नहीं चाहते हैं। बातें स्वस्थ लाेकतंत्र की करते हैं और अंदर ही अंदर एससी एसटी के नाम पर दूसरों का शोषण करने की फिराक में रहते हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जाति के नाम पर भेदभाव करने वालों की ही राेटियां पकती हैं और बाकी उपदेश देकर अपने कर्तव्याें की पूर्ति कर लेते हैं ।

हाल ही में जो मध्य प्रदेश के धार जिले में सिपाही की भर्ती के दाैरान अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के उम्मीदवाराें के सीने पर ‘ एससी व एसटी ‘ लिखा गया वह बेहद शर्मनाक है । दुनिया के सबसे बड़े लाेकतांत्रिक देश हाेने का दावा करने वाले भारत के हर नागरिक के लिए यह कृत्य अफसाेसजनक है। इक्कीसवीं सदी में भी ऐसी भेदभावपूर्ण घृणित साेच हम सबकाे कठघरे में खड़ा कर देने पर मजबूर करती है । आखिर विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले आम जनमानस से लेकर बुद्धिजीवियाें तक जाति का दंश अब तक क्यों पल पुस रहा है? क्याें नहीं हम सबकाे साथ लेकर चल पा रहे हैं? सबका साथ सबका विकास की सूक्ति सबकी समझ से क्याें परे है? कहीं कुछ ताे है जाे सबकाे साथ लेकर चलने में सक्षम नहीं है और हम जाति और धर्म के मकड़जाल में और अधिक फंसते जा रहे हैं। एक दूसरे काे काेसते हैं, धिक्कारते हैं लेकिन ठाेस समाधान नहीं निकाल पाते ।

यदि हमें सचमुच में भेदभाव रहित समाज की नींव डालनी है ताे अपनी संकीर्ण साेच काे बदलना हाेगा। समाज में शिक्षा का उजाला फैलाकर लाेगाें में समाजवाद की अलख काे जगाना हाेगा। सबकाे जातिवाद के दानव से ऊपर उठते हुए आगे आने के लिए प्रेरित करना हाेगा तभी हमारा और हमारे देश का उद्घार संभव है ।