सुशांत सिंह राजपूत केस- न्याय की सीबीआई की ओर आस

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पराग कमठान।  आखिरकार सुशांत केस में सुप्रीम काेर्ट का केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई काे जांच साैंपने का निर्णय सत्य की पहली जीत है। यह काम ताे बहुत पहले हाे जाना चाहिए था लेकिन देर आए दुरूस्त आए की तर्ज पर यह प्रकरण कई ऐसे राज़ खाेलेगा जाे यकीनन सबके हाेश उड़ा देगा। इस मामले में दो महीने से मुंबई और बिहार पुलिस के बीच खींचतान चल रही थी। इस केस को लेकर दोनों राज्यों में राजनीति भी खूब हो रही है। 

सभी काे मालूम है कि रिया और उसके वकील ने सरकार और जनता काे गुमराह करने के अनेकाें हथकंडे अपनाए लेकिन न्याय व्यवस्था के आगे एक न चली।

यह सर्वविदित है कि  सीबीआई के सामने चुनाैतियाें की झड़ी लगी हुई है।सुशांत केस को दो माह से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान साक्ष्याें और गवाहों के ऊपर जो दुष्प्रभाव डाला जाना था और उन्हें प्रभावित करने की जो कोशिशें होनी थी, वो तो काफी हद तक हो चुकी है। इतने दिनाें में गवाह प्रभावित हो गए। कुछ गवाह बाकी हैं, जिन्हें जान का खतरा है। जिन पांच डॉक्टरों ने सुशांत का पोस्टमार्टम किया था वो या ताे भूमिगत हो चुके हैं या फिर उन्हें जान का खतरा है। दिशा सालियान केस के मामले में मुंबई पुलिस के अनुसार फाइलें डिलीट हो गईं। मुंबई पुलिस ने मामले में आज तक FIR तक दर्ज नहीं की, बस ऐसे ही जांच कर रही है। सीसीटीवी फुटेज और कॉल रिकॉर्डिंग जैसे साक्ष्य होने के बावजूद मुंबई पुलिस इस केस में पहले दिन से लापरवाही बरत रही है। यकीनन दाल में बहुत कुछ काला है। 

यह समझ में आ जाता है कि मुंबई पुलिस इस केस में जानबूझ कर लापरवाही करती गई और सबूताें की अनदेखी करती गई। दरअसल बिहार पुलिस की सुशांत केस में इंट्री काेई मात्र संयाेग ही नहीं है बल्कि उसे इस संगीन मामले में मुंबई पुलिस के ढुलमुल रवैये के चलते आना पड़ा। 

फिलहाल केस सीबीआई के पाले में है और उसे चिरपरिचित अंदाज़ में तेज़तरा्र तरीके से पूरे मामले की तह में जाना हाेगा क्याेंकि रहस्याें की पर्त काफी माेटी है। इसीलिए कहता हूं कि समय कम है राज़ बहुत हैं, हम सबकाे सीबीआई पर आशा बहुत है नहीं ताे कहीं यह भी दूसरा आरूषि मर्डर केस ना बन जाए।

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