‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र से ही चीनी निर्भरता का कर सकेंगे पूर्ण बहिष्कार

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प्रतीक वाजपेयी। विश्व भर में फैले कोरोना वायरस की वजह से सभी देशों की नजरों में चीन की छवि धूमिल हो गयी है। इसके बाद कई सक्षम देशों ने व्यापार के लिए चीन का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में बीते दिनों हुए भारत-चीन सीमा विवाद के बाद भारत सरकार ने चीन के 59 मोबाइल ऐप्लीकेशन पर पाबंदी लगाकर उसकी तकनीकी क्षमता पर करारा प्रहार किया है।

इन ऐप्लीकेशन में टिकटॉक, शेयर-इट और वी चैट जैसे ऐप शामिल हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि भारत सरकार के इस कदम से चीन को कितना नुकसान होगा ? क्योंकि ज्यादातर ऐप मुफ्त हैं। हालांकि भारत में यूजर की संख्या ज्यादा होने से ऐप निर्माता एड के जरिये कमाई जरूर कर लेते हैं। सेंसर टॉवर के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में डाउनलोड किए गए टॉप 10 ऐप(नॉन गेमिंग) में से छह ऐप्लीकेशन चीन के थे। इनमें भी टिकटॉक शीर्ष पर था और यह सब महज चार सालों की छोटी सी अवधि में हासिल किया गया।

लेकिन क्या भारत में चीन की मौजूदगी सिर्फ सॉफ्टवेयर और अन्य तकनीक तक ही सीमित है ? तो इसका जवाब है, ‘नहीं’। भारत के हर घर में चीनी सामान की मौजूदगी है। किचन, बेडरूम, हॉल या कोई भी जगह चीनी सामान से अछूती नहीं रही है। हर हाथ में दिखने वाले अधिकतर मोबाइल फोन भी चीन द्वारा ही बनाए हुए हैं। इस तरह चीन हमारी रोज की जिंदगी से जुड़ा हुआ है।

अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI) की बात करें तो चीन ने भारत में छह अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश कर रखा है।
एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 30 यूनिकार्न कंपनियों में से 18 में चीन एक बड़ा हिस्सेदार है। इसे अगर भारत की तकनीकी क्षमता पर चीनी कब्जा कहें तो गलत नहीं होगा। इसके बाद हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा जिसकी मांग भारत से अमेरिका समेत कई देशों ने की थी उसका कच्चा माल भी चीन से आयात किया जाता है।

यदि इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाए तो यह साफ है कि चीन का पूर्ण विरोध कैंपन चलाने के विचार से जरूर अच्छा है पर इस पहल को पूरी तरह से अमलीजामा पहनाना बहुत कठिन है। हालांकि प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर’ जैसे आवाहन से लोगों में स्वदेशी अपनाने की भावना जागृत जरूर हुई है और आशा भी की जा सकती है कि भविष्य में भारत आत्मनिर्भर बनकर जरूर सामने आएगा।

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