युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद के व्यक्तिव में कर्म, ज्ञान और भक्ति का अनूठा संगम

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  • राष्ट्रीय युवा दिवस पर विशेष लेखक-प्रतीक बाजपेयी

भारतवर्ष को आज तक जितने भी महापुरुषों ने गौरवान्वित किया है, उनमें स्वामी विवेकानंद जी का नाम सदा आदर से लिया जाता रहा है। कर्म, ज्ञान और भक्ति का त्रिवेणी संगम हमें उनके व्यक्तित्व में देखने को मिल जाता है। उन्होंने अपनी साधना और व्यक्तित्व से न केवल भारतीयों को प्रभावित और लाभान्वित किया, बल्कि विदेशी विचारकों और दर्शन पर भी पर्याप्त प्रभाव डाला। एक वक्त जब हमारा देश अंग्रजी शासकों से आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, उस समय स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी साधना द्वारा भारतीयों को कर्मठता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया। आज के युग में युवा तरह-तरह के कार्यों में संलिप्त है, जिसकी वजह से वो अपने मूल कर्तव्यों को भूलता जा रहा है। इसलिए उनको यह जानना अत्यावश्यक है कि कर्म और कर्तव्य की सही परिभाषा क्या है? कर्म और कर्तव्य का बोध व्यक्ति को विवेकी बनाता है साथ ही उसका मार्गदर्शन भी करता है।

इन दोनों तत्वों को अच्छी तरह समझने के लिए हमें पहले दोनों के बीच के अंतर को समझना होगा। कर्म वो है जो कुछ भी हम करते हैं, वो हमारी जीविका से संबंधित भी हो सकता है और नहीं भी। वहीं कर्तव्य वो है, जो हमें करना चाहिए, जो समाज के हित के साथ-साथ धर्महित में भी हो।  सही अर्थ में कर्तव्य की व्याख्या करना भी मुश्किल है। जिस व्यक्ति को कर्तव्य सबसे प्रिय होता है वो अपनी आत्मा की आज्ञा के अनुकूल कर्म करता है। अगर कृतकर्म की बात करें तो उससे कर्तव्य का निश्चय नहीं हो सकता क्योंकि कर्म से कर्तव्य निहित होता है। उदाहरण के रूप में देखें तो जिस कर्म से हम ईश्वर की ओर जाते हैं, वह शुभकर्म और हमारा कर्तव्य है, वहीं जिन कर्मों से हम नीचे की ओर जाते हैं, वो अशुभ कर्म और अकर्तव्य है। जैसे प्राचीनकाल में कुख्यात डाकू किसी मनुष्य को मारकर उसका धन छीन लेने को वे अपना कर्तव्य समझते थे। उन्हें लगता था कि जितने ज्यादा लोगों को वो मारेंगे, लूटेंगे उतना वे अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। कहीं-कहीं कर्तव्य की परिभाषा भी परिस्थिति के अनुरूप ही होती है, क्योंकि एक समान कर्म पर विरोधाभास भी देखने को मिलता है। जैसे यदि कोई व्यक्ति किसी को सड़क पर मार दे तो उसे इसका दुख होगा क्योंकि ये उसके कर्तव्य के विपरीत होगा। परंतु वही व्यक्ति अगर देश की सीमा पर शत्रुओं को मार देता है तो वो इसके लिए गर्व महसूस करता है और ये समझता है कि उसने अपने कर्तव्य का पालन किया। इस तरह ये पूर्णतः साफ हो जाता है कि कर्म ही होते है जो किसी को महान बनाते हैं और पतन की ओर भी ले जाते हैं। लेकिन कर्तव्य के विषय में ये बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि वो कौन से काम होंगे जो किसी को ऊपर उठाएंगे और कौन से नीचे की ओर ले जाएंगे। इसके लिए स्वामी विवेकानन्द जी ने अपनी पुस्तक कर्मयोग में भगवद्गीता का उल्लेख कर बताया है कि गीता में जन्म और जीवन के अनुसार धर्म की ओर आकर्षित किया गया है। अधिकतर ऐसा देखने को मिलता है कि व्यक्ति के कर्म का निर्धारण उसकी श्रेणी से होता है। अतः व्यक्ति उन्हीं विचारों और आचरण को अपनाता है, जो उसे उसके समाज से मिले हैं। हमारा धर्म भी यही कहता है कि जिस समाज में हम उन्नत हुए हैं उसी के आदर्श और कर्मों का हम ध्यान रखें।

एक भारत निवासी समझता है जो कुछ भी उसके देश की धारणाएं हैं या जो कुछ भी वह करता है, वही उत्तम कर्तव्य है, जो भी उसका पालन नहीं करता, वो जरूर असभ्य होगा। यही बात अमेरिका निवासी पर भी लागू होती है। जो भी व्यक्ति उनके आदर्शों का पालन नहीं करता वो उनके लिए असभ्य ही होगा। स्वंय स्वामी विवेकानन्द भी एक बार इस धारणा के शिकार हो गए। लेखक मणि शंकर मुखर्जी द्वारा लिखी गई पुस्तक “विवेकानंद की आत्मकथा” में स्वामी जी के साथ हुई एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक बार शिकागो का मेला घूमते समय एक आदमी उनके पीछे आया और बड़ी जोर से उनकी पगड़ी खींच ली। उन्होंने घूमकर देखा तो उन्हें भली पोशाक में एक सभ्य-सा व्यक्ति दिखाई दिया। इसके बाद उन्होंने उस व्यक्ति से अंग्रेजी में बात की, जिसके बाद उसे बड़ी लज्जा महसूस हुई। संभवतः इसका कारण यह रहा होगा कि उस व्यक्ति ने ये सोचा भी नहीं होगा कि वे अंग्रेजी भी बोल सकते हैं। परंतु ये कोई नई बात नहीं है अजनबी आदमी को साधारणतः नए देशों में ऐसे आचरण का सामना करना ही पड़ता है। ऐसी परिस्थिति तब भी आ जाती है जब हम अपने आदर्शों को संसार के आदर्श समझ बैठते हैं। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि विदेशी लोग आचरणहीन होते हैं। ये तो बस उनके आदर्श है जो किसी और रीति-रिवाज और संस्कार को मानने की आज्ञा नहीं देते, लेकिन यह स्वाभाविक भूल है, जो लोग बड़ी आसानी के साथ कर जाते हैं। ये भूल ही संसार में अमीर-गरीब, काला-गोरा जैसे तत्वों के बीच रेखा खींच देती है और आधे से अधिक दुःखों का कारण बनती है।

यदि कर्तव्य को देश और समाज से हटकर देखें तो जन्म के अनुकूल जो हमारा कर्तव्य है हमें उसे ही करना चाहिए। जीवन में हर व्यक्ति का कोई न कोई स्थान होता ही है और उसके अनुरूप ही कर्तव्य का पालन होना चाहिए, लेकिन प्रायः ऐसा देखने को नहीं मिलता क्योंकि मानव स्वयं को कभी स्वच्छ दृष्टि से देखता ही नहीं है। आम जीवन में ऐसा देखा जाता है कि हमारी बड़े-बड़े काम करने की अभिलाषा होती है पर जब हमें वो काम मिलता है तब ही हमें उस काम से जुड़ी चुनौतियों का पता चलता है। उस काम को भले ही हम मन लगाकर क्यों न कर रहे हों पर जब हम पर चारों ओर से प्रकृति की मार पड़ने लगती है तब हम शीघ्र ही जान जाते हैं कि हमारा कार्य-क्षेत्र क्या है और इस बात में कोई दो राय नहीं कि एक असमर्थ व्यक्ति बहुत दिनों तक उस पद पर नहीं टिक सकता जिसके लिए वो योग्य नहीं है। इस स्थिति में व्यक्ति को पहले वो कार्य करके खुद को साबित करना चाहिए, जो उसे दिया गया है फिर चाहे वो काम कितना भी छोटा क्यों न हो। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि किसी व्यक्ति का कद उसके काम से नहीं देखा जाता अपितु इस आधार पर देखा जाता है की वो उस काम को कितनी लगन व निःस्वार्थ भाव के साथ करता है और कर्तव्य का निश्चय तो हमारी परिस्थितियों से होता है। इसमें छोटा-बड़ा नहीं होता। जो किसी स्वार्थ भावना के कारण कर्तव्य का पालन नहीं कर पाता वो अपने भाग्य को दोष देता फिरता है। यहीं से कर्तव्य का विचार भी बदल जाता है और हम देखते हैं कि सबसे महान कार्य वही होता है, जिसका प्रेरक स्वार्थ कोई नहीं होता।

कर्तव्य पालन बहुत हद तक हमारी योग्यताओं पर भी निर्भर करता है, जिसे हम प्रायः स्वीकार नहीं कर पाते। स्वामी विवेकानन्द जी ने भी कर्म के संदर्भ में यही कहा है कि “हमें सर्वप्रथम अपने निकटतम कर्तव्य का पालन करना चाहिए और एक-एक सीढ़ी चढ़कर ही अन्य कर्तव्यों की ओर बढ़ना चाहिए। सदैव विरोध करने वाले व्यक्ति के लिए सभी कार्य अमान्य है, ऐसा व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं होता। इसलिए आओ कर्म करें, जो भी सामने कर्तव्य आए उससे मुंह न मोड़ें और उसकी पूर्ति के लिए जो भी जरूरी हो वो कर्म करें। तब जाकर कहीं हमारा जीवन सफल हो पाएगा।“

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