शिशु की बदलती हरकतें विकास का संकेत

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जन्म के बाद चिकित्सीय चार्ट के अनुसार हर तीसरे महीने में शिशु में नया परिवर्तन दिखाई देता है जो उसके उत्तरोत्तर विकास का संकेत है। कुछ बच्चों में यह परिवर्तन एक दो माह देरी से होता है जिसे लेकर माता-पिता को चिन्तित नहीं होना चाहिये।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर प्रसूति केन्द्र का प्रभार संभाल रही महिला चिकित्सक डा. पवित्रा सिंह कुशवाह बताती हैं कि यदि आपका लाड़ला अपने चेहरे पर बराबर परिवर्तन के संकेत दे रहा है तो फिर आप निश्चिंत रहें उसे कोई बीमारी नहीं है। समय से टीकाकरण कराएं। जन्म के तीसरे महीने में शिशु तेज प्रकाश और आवाज से अपना सिर इधर उधर घुमाकर संकेत देता है, यानि वह आभास कर रहा है, दोनों हाथों की मुट्ठी बांधने, बालों को पकड़ना, खिखिलाकर हंसना, बांहों और टांगों से धक्का मारने जैसी हरकतें अच्छे विकास के संकेत हैं। धीरे धीरे शिशु जब छठवें महीने में प्रवेश करता है तब तक हल्की चीजों को उठाने का प्रयास, पलटी मारना, रंग-बिरंगे खिलौनों की पहिचान करना शुरू कर देता है। नवें महीने तक वह दूध की बोतल पकड़ने में सहयोग शुरू कर देता है। एक साल का होते होते वह बिना सहारे बैठने, खड़े होकर चलने की कोशिश करने, इशारों को समझने, परिजनों के चेहरों की पहचान करने, आवाज की पहचान करने जैसी हरकतें स्वस्थ शिशु की पहचान होती है। यदि माता अच्छी देख भाल करती है तो फिर दो साल का होते होते शिशु शब्दों को जोड़ कर बोलने का प्रयास भी करने लगता है। इस समय जितना शिशु से वार्तालाप करेंगे उतनी जल्दी वह बोलने सीखेगा।

पौष्टिक आहार की कमी रोक सकती है शिशु का विकास

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्साधीक्षक और बाल रोग विशेषज्ञ डा.चन्द्र मोहन यादव कहते हैं कि जन्म के तुरन्त बाद शिशु को केवल मां का दूध ही देना चाहिये। बालक जन्म के बाद 24 घंटे में लगभग 12 बार दूध पीता है तथा इस क्रिया में एक बार में 20 से 25 मिनट का समय लगाता है, इस समय मां को बच्चे को दूध पिलाने में पूरा समय देना चाहिये। बच्चे के विकास में आहार की कमी उसकी शारीरिक वृद्धि में रूकावट डाल कर शिशु को कुपोषण का शिकार बनाकर तमाम बीमारियां पैदा कर सकती हैं। यदि विकास के संकेत दो तीन माह देरी से भी होते हैं तो चिंता की बात नहीं है लेकिन अधिक समय लगने पर चिकित्सक का परामर्श लेना चाहिए।