नाग पंचमी पर क्यों करते हैं नागों की पूजा?

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श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि यानी इस वर्ष 5 अगस्त को नाग देवता की पूजा की जाएगी। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागों की पूजा के संदर्भ में एक कथा हैं, जिसमें नागों की पूजा के कारण का उल्लेख मिलता है।

पुराणों में यक्ष, किन्नर और गन्धर्वों के वर्णन के साथ-साथ नागों का भी वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान शिव के अलंकरण में वासुकी की महत्वपूर्ण भूमिका है। 

नाग पंचमी की कथा के श्रवण का बड़ा महत्व है। एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मन्थन से चौदह रत्नों में उच्चै:श्रवा नामक अश्वरत्न प्राप्त किया था। यह अश्व अत्यन्त श्वेत वर्ण का था। उसे देखकर नागमाता कद्रू तथा विमाता विनता- दोनों में अश्व के रंग के सम्बन्ध में वाद-विवाद हुआ। कद्रू ने कहा कि अश्व के केश श्यामवर्ण के हैं। यदि उनका कथन असत्य सिद्ध हो जाए तो वह विनता की दासी बन जाएंगी अन्यथा विनता उनकी दासी बनेगी।

कद्रू ने नागों को बाल के समान सूक्ष्म बनाकर अश्व के शरीर में प्रवेश होने का निर्देश दिया, किन्तु नागों ने अपनी असमर्थता प्रकट की। इस पर क्रोधित होकर कद्रू ने नागों को शाप दिया कि पाण्डव वंश के राजा जनमेजय नागयज्ञ करेंगे, उस यज्ञ में तुम सब भस्म हो जाओगे। 

नागमाता के शाप से भयभीत नागों ने वासुकि के नेतृत्व में ब्रह्मा जी से शाप निवृत्ति का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी ने निर्देश दिया कि यायावर वंश में उत्पन्न तपस्वी जरत्कारु तुम्हारे बहनोई होंगे। उनका पुत्र आस्तीकि ही तुम्हारी रक्षा करेगा। ब्रह्मा जी ने पंचमी तिथि को नागों को यह वरदान दिया तथा इसी तिथि पर आस्तीक मुनि ने नागों का परिरक्षण किया था। अत: नाग पंचमी का यह व्रत ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हमारे धर्मग्रन्थों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजा का विधान है।