Newsi7 Special- लोक सभा चुनाव में वोटर के मन की बात

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शरद मिश्र, लखनऊ। चुनावी समर चरम पर है। जहां सभी पार्टी, प्रत्याशी, समर्थक अपने पक्ष में पूरा जोर लगा रहे हैं , वहीं देश का मतदाता भी नई सरकार के गठन में अपनी सहभागिता निभा रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2019 के छठे चरण का मतदान संपन्न हो गया , अब रह गया शेष सातवां और अंतिम चरण।

अब तक देश की 85 फ़ीसदी से अधिक सीटों पर मतदान हो चुका है, या यूं कहें की नई सरकार के गठन का मत मतपेटियों तक पहुंच चुका है। अब देशवासियों को बेसब्री से 23 मई, मतगणना वाले दिन की प्रतीक्षा है। यह चुनाव वाकई देश की सियासत के लिए अहम है ।जहां एक ओर एनडीए सरकार लगातार दूसरी बार सत्तासीन होने की तैयारी कर रही है , तो वहीं कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां ,वर्तमान एनडीए सरकार को हटाने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं।

विपक्षी दल जहां सरकार को आर्थिक सुधार, कथित भ्रष्टाचार, रोजगार, कृषि जैसे कई मुद्दों पर घेरने का प्रयास कर रहे हैं , वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार दोबारा सत्ता में आने के लिए विकास, राष्ट्रवाद , राष्ट्रीय सुरक्षा, मजबूत सरकार, सहित सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता के बीच रख रही है।सभी दलों ने अपने सारे पत्ते खोल कर इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है।

अबकी बार के चुनाव में जहां एक ओर नए वोटर निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे हैं , वहीं वरिष्ठ नागरिकों की भी अहम भूमिका है । दोनों ही बड़ी संख्या में मतदाता हैं। चुनाव आयोग के जागरूकता और अन्य प्रयासों से मत प्रतिशत में बढ़ोतरी के साथ-साथ अधिकांश चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न हो रहा है । मतदान प्रतिशत और अधिक नजर आ सकता था, यदि वोटर लिस्ट में और सुधार किया जाए , क्योंकि अब भी सुनने को मिलता है कि, “मेरा यहां भी वोट है और कहीं और भी, लेकिन मैंने मतदान एक ही जगह किया”। अन्य जगहों पर उसी मतदाता का नाम , मतदाताओं की संख्या को बढ़ाता है, जो कि वास्तविक मतदाता नहीं है। लेकिन इस सब पर भी भारत का चुनाव प्रबंधन बड़ा , व्यापक और देश-विदेश में सराहा जाने वाला रहा है ।

यह चुनाव न्यायपालिका के हस्तक्षेप के लिए भी याद किया जाएगा । जहां उसने चुनाव आयोग से जवाब मांगा , वहीं विपक्षी पार्टियों के वीवीपैट व कुछ अन्य मुद्दों पर भी टिप्पणी दी।
यदि इस बार के राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा की जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए एक बड़ा और मजबूत गठबंधन नजर आता है । जहां बिहार में भाजपा जेडीयू, लोक जनशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन में है, तो महाराष्ट्र में शिवसेना जैसी बड़ी क्षेत्रीय पार्टी से उसका गठबंधन है । पंजाब में अकाली दल भाजपा का पुराना और बड़ा प्रांतीय सहयोगी रहा है। इसी प्रकार एनडीए अन्य राज्यों में भी अपने गठबंधन के सहयोगियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहा है।

वहीं कांग्रेस का बिहार में आरजेडी और तमिलनाडु में डीएमके के अलावा अन्य प्रांतों में कोई बड़ा गठबंधन का सहयोगी नजर नहीं आता। महागठबंधन की बात की जाए तो सपा-बसपा का उत्तर प्रदेश के बाहर कोई व्यापक असर नहीं है।
अन्य विपक्षी दल जो क्षेत्रीय तौर पर तो अपनी पहचान रखते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अन्य पार्टियों से उनका कोई समन्वय नजर नहीं आता। जैसे बंगाल में तृणमूल, महाराष्ट्र में एनसीपी,आंध्र में चंद्र बाबू नायडू उड़ीसा में नवीन पटनायक व बाकी क्षेत्रीय दल।

इन सभी समीकरणों का जमीनी स्तर पर और आंकड़ों के हिसाब से यदि विस्तृत विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस गठबंधन और महागठबंधन व अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के बिखराव का फायदा एनडीए को मिलता नजर आ रहा है और अन्य पार्टियां इस रण में पिछड़ती नज़र आती हैं। लेकिन परिणाम पूर्व कुछ भी निष्कर्ष निकलना जल्दबाजी होगा क्योंकि वोटर के मन की बात तो 23 मई को ही पता चल सकेगी।