सपा-बसपा का गठबंधन यूपी की सियासत में क्या रंग लाएगा, पढ़ें और जाने

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लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) शुरू होने की उलटी गिनती अब महीनों में नहीं, बल्कि दिनों में होने लगी है। देखा जाए तो आम चुनावों में अब 90 दिनों से भी कम समय बचे हैं। जनवरी की ठंड में मई वाली गरमाहट की आहट हाे चुकी है क्योंकि सियासी पैंतरों की जोर आजमाइश अब राजनीति के अखाड़े में नजर आने लगी है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रीय अधिवेशन करके चुनावी समर का बिगुल फूंका तो उसी समय यूपी की राजधानी लखनऊ में सपा-बसपा के बीच गठबंधन की एक नई इबारत लिखी जा रही थी।

यूपी में सपा -बसपा ने कांग्रेस को किया किनारे...

सपा-बसपा का गठबंधन यूपी की सियासत में विपरीत पाटों पर खड़े दो ऐसे दलों का गठबंधन है, जो दशकों तक एकदूसरे के लिए अछूत बने रहे। इसके पहले 1990 के दशक में ही यह संयोग बना था जब यूपी की राजनीति में सपा-बसपा एकदूसरे के करीब आए थे। लेकिन लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड ने इन दोनों दलों के बीच खाई इतनी चौड़ी कर दी कि इसे भर पाना असंभव नजर आने लगा था।

चुनावी मौसम में सपा-बसपा का जुटान तो दिख रहा है, लेकिन इनके बीच ‘मेल’ को लेकर अभी भी पर्याप्त संदेह सभी के मन में है। सवाल है कि आखिर इस बेमेल गठबंधन की मजबूरियों की जड़ें कहां हैं? सपा-बसपा के गठबंधन में अवसरवाद से ज्यादा भाजपा के समक्ष इन क्षेत्रीय दलों के कमजोर हुए जनाधार की स्वीकारोक्ति नजर आती है। दरअसल पिछले दो चुनावों, लोकसभा और विधानसभा के परिणामों ने यह सिद्ध किया है कि मोदी के खिलाफ सपा अथवा बसपा का अकेले जनाधार बहुत ही कमजोर हो चुका है।

बेशक वे खुले तौर पर मोदी के सामने अपने कमजोर जनाधार को नहीं जाहिर करते हों, लेकिन आंतरिक रूप से इसकी स्वीकार्यता ने ही इस बेमेल गठबंधन को जन्म दिया है। मोदी को रोकने की जद्दोजहद ने ही इन दोनों विरोधियों को एकजुट किया है। शायद यही वजह है कि अमित शाह इन चुनावों को पानीपत की तीसरी लड़ाई जैसा बता रहे हैं।