राफेल डील के विवाद की क्या है जड़? जाने

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सरकार हो या विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर हमला करने के लिए अभी से राफेल का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। हालात ये हैं कि विपक्ष राफेल डील पर सरकार को सड़क से संसद तक घेरने का प्रयास कर रहा। नतीजा  न तो संसद चल रही है और न ही आम लोगों के हित के लिए लटके हुए बिल पास हो पा रहे हैं। ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी है कि राफेल डील के विवाद की जड़ क्या है? साथ ही सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिकल्स लिमिटेड (HAL) क्यों बाहर हुई और उसे बाहर करने या अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड (RDL) को सौदा दिलाने में सरकार की कितनी भूमिका है?

केंद्र सरकार ने राफेल विवाद में सुप्रीम कोर्ट को सौदे से संबंधित जानकारियां दी थीं। इसमें विमान की कीमत (सीलबंद लिफाफे में) से लेकर HAL के डील से बाहर होने की वजह विस्तार से बताई गई है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि फ्रांस से 36 लड़ाकू विमान राफेल के लिए हुई डील में 2013 की रक्षा खरीद प्रक्रिया का ही पालन करते हुए और बेहतर शर्तों पर बातचीत की गई थी। सौदे से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति ने भी मंजूरी दी थी।

सरकार ने आरडीएल को डील में शामिल करने के लिए फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया। ऐसा संभव भी नहीं है, क्योंकि रक्षा ऑफसेट दिशानिर्देशों के अनुसार दसॉ एविएशन, ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने के लिए अपने भारतीय ऑफसेट सहयोगी का चयन करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।

सरकारी कंपनी एचएएल इस डील से बाहर हुई थी  इसके लिए एचएएल की खराब हालत को जिम्मेदार बताया गया था। साथ ही राफेल विमानों का भारत में उत्पादन करना काफी महंगा साबित हो रहा था। दरअसल एचएएल के पास इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वह फ्रांस की कंपनी दॉसो एविएशन संग भारत में इस लड़ाकू विमान का निर्माण कर सके।

एचएएल के डील से बाहर होने की दूसरी अहम वजह ये है कि भारतीय वायुसेना को इन लड़ाकू विमानों के लिए समय सीमा में विमान आपूर्ति और उसकी तकनीक की गारंटी चाहिए थी और एचएएल इस तरह की गारंटी देने को तैयार नहीं थी।