उत्तराखंड में इन इलाकों में विदेशी आते हैं अपनों की कब्रें खोजने

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देहरादून: अपने पूर्वजों के बारे में हर कोई जानना चाहता है कि उसके पूर्वज कैसे रहते थे? उनका जीवन दर्शन क्या था? उनका जीवन कैसे गुजरा था? इन तमाम सवालों के जवाब खोजने के लिए विदेशी, उत्तराखंड का रुख कर रहे हैं. वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्‍योंकि ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ऑस्‍ट्रेलिया जैसे देशों के सैकड़ों नागरिकों की उत्तराखंड में कब्रें हैं.

 

प्रदेश के नैनीताल, रानीखेत, मसूरी और लैंसडाउन में ऐसे कब्रिस्तान हैं, जहां ब्रिटिशकाल के दौरान अपने जीवन के अंतिम दिनों को बिताने वाले अधिकारियों और सैनिकों की कब्रें हैं.

उत्तराखंड का पर्यटन विभाग अब ‘नो योर रूट’ (जड़ों को पहचानें) की योजना शुरू कर रहा है, ताकि ब्रिटिश काल के दौरान जिन विदेशियों का निधन यहां हुआ था और जिन्‍हें यहां दफनाया गया, उन कब्रों को पहचान कर उनके वंशजों को बताया जा सके.

इस तरह की उपलब्‍ध जानकारी के आधार पर वे उत्तराखंड की ओर रुख कर सकते हैं. इसके बहाने वे इस क्षेत्र से रूबरू हो सकते हैं. साथ ही उन्हें अपने पुरखों के जीवन के बारे में सटीक जानकारी भी मिल सकेंगी कि वे कैसे रहते थे? क्या करते थे? और अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे कहां रहते थे?

देश की आजादी के पहले हजारों विदेशियों का घर उत्तराखंड में था. इसमें ब्रिटेन, फ्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्‍ट्रेलिया जैसे देशों के नागरिक शामिल थे. कहा जाता है कि ये विदेशी खासतौर से छावनी वाले इलाकों में रहते थे. इसमें भारी संख्या में ऐसे विदेशी भी थे जिन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांस यहीं ली. उनके परिजन ने उन्हें इन्ही कब्रों में दफनाकर अपने-अपने देशों को चले गये. 18वीं सदी में बने इन कब्रिस्तानों में हजारों विदेशी शामिल हैं. जिनके कब्रों के ऊपर उनके नाम भी लिखे हैं मगर बहुत कब्रें ऐसी भी है जिनके बारे में बहुत जानकारी नहीं है.

इन कब्रों में दफन कुछ मशहूर हस्तियां भी शामिल हैं. मसलन महारानी लक्ष्मीबाई का अंग्रेजों के खिलाफ मुकदमा लड़ने वाले ऑस्‍ट्रेलिया के जॉन लैंग की कब्र मसूरी में बताई जाती है. इतना ही नहीं कई बिट्रिश सैन्‍य अधिकारियों और उनके परिजनों की कब्रें आज भी देहरादून में देखने को मिल सकती हैं. साथ ही सैकड़ों सैनिकों की भी कब्रें यहीं हैं.

इस संबंध में पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर का कहना है कि यूरोपियन देश में इस तरह का संकल्‍पना लंबे समय से चल रही है. उसी की तर्ज पर उत्‍तराखंड में नो योर रूट (Know your roots) यानी अपनी जड़ों को पहचानें की योजना शुरू की जा रही है. इस कड़ी में मसूरी, नैनीताल जैसे स्थानों के कब्रिस्तान के कब्रों की सूची तैयार की जा रही है. इसका एक डाटा तैयार किया जा रहा है जिससे लोग अपने वंशजों के बारे में जानकारी ले सकें.

ये दीगर बात है कि कई ऐसी कब्रें हैं जिनके बारे में बहुत जानकारी नहीं है. मगर विदेशी लोग अपनों की तलाश में कब्रिस्‍तानों तक पहुंच रहे हैं. इसमें से कुछ ऐसे भी विदेशी हैं जिन्हें अपनों की कब्रों को पहचानने में कामयाबी मिली है. दरअसल कई कब्रिस्तानों में बनी कब्रें टूट रही हैं. अब उन कब्रों को बचाने की आवाज भी उठ रही है. फिलहाल कब्रिस्तानों के पुराने दस्तावेजों के आधार पर इनके वंशजों की तलाश शुरू होने जा रही है. इससे माना जा रहा है कि प्रदेश में विदेशी सैलानियों की तादाद बढ़ सकती है.

मसूरी
मसूरी कब्रिस्तान में ब्रिटिशकाल के दो कब्रिस्तान हैं. इसकी स्थापना साल 1829 के करीब बतायी जाती है. इनमें से एक लंढौर और दूसरी कैमल्स बैंक रोड के पास है. इसमें भारी संख्या में विदेशियों की कब्रें है मगर काफी कब्रें टूट चुकी हैं.

रानीखेत
अल्मोडा के रानीखेत में ब्रिटिश सेना ने 1869 में एक रेंजीमेंट खोला था. इसी के साथ एक कब्रिस्‍तान बनाई गई थी जिसमें यूरोपियन देशों के करीब 30 बड़े अधिकारियों की कब्रें बनी हैं.

नैनीताल
यूं तो नैनीताल में करीब 5 कब्रिस्तान बनी थीं जिसमें से तीन का अस्तित्‍व करीब-करीब समाप्त हो चुका है जबकि दो कब्रिस्तान आज भी मौजूद हैं. कालाढूंगी मार्ग के करीब जंगलों के पास सीमिट्री नियर पाइंस नाम की कब्रिस्तान मौजूद है जिसमें ब्रिटेन के कई नागरिक अपनों के कब्र की तलाश कर रहे हैं.

लैंसडाउन
इस कब्रिस्तान के बारे में काफी सटीक जानकारी है यहां ब्रेटन के कई अधिकारियों की कब्रें मौजूद हैं, जहां ब्रेटन के लोग आते रहे हैं.

इस संबंध में डीएवी पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ आरएस दीक्षित का कहना है कि देश की आजादी के पहले भारी संख्या में विदेशी नागरिक यहां की शांत वादियों में रहते थे. जिनके निधन के बाद उन्हें यहां दफनाया गया. उनका कहना है कि अब पर्यटन विभाग जिस तरह से उनके वंशजों की तलाश कर रहा है, इससे पर्यटन की अपार संभावनाएं बढ़ रही हैं.

उनका कहना है कि मसूरी में ब्रिटिशकाल की दो कब्रें है। इसी तरह से प्रदेश के दूसरे स्थानों पर भी कब्रें है जिनके बारे में अगर सही तरह से खोज होती है तो उस दौर के आर्थिक सामाजिक स्थिति के बारे में बिल्कुल सटीक जानकारी मिल सकती हैं.

साभार- जी न्यूज़