बच्चों की अच्छी परवरिश कहीं छूट तो नहीं रही, हो जायें सर्तक

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एक चीनी कहावत है—जितनी सावधानी से छोटी मछली के व्यजंन पकाए जाते हैं, उतनी ही नजाकत से संभालना पड़ता है एक परिवार को।

चीन और जापान ने इस कहावत की बुनियाद को लगता है बहुत गंभीरता से ले लिया, यही वजह है कि आज की तारीख में जापान और चीन में बच्चों की संख्या लगातार घटती जा रही है। जापान में तो यह आलम है कि पिछले पंद्रह सालों में शादीशुदा दंपतियों ने अभिभावक बनने से लगभग इनकार कर दिया है। हमारे यहां स्थिति अलग है। अभिभावक बच्चों की परवरिश यानी पेरेंटिंग को पिछले दो दशक से गंभीरता से लेने लगे हैं। मध्य वर्ग के अभिभावक आज भी अपने बच्चे की पैदाइश से ले कर उसके वयस्क होने तक उसकी हर उपलब्धियों पर अभिभूत रहते हैं।

माता-पिता की कोशिश रहती है कि वे अपने बच्चों को हर वो चीज मुहैया करवाएं, जो उन्हें हासिल नहीं हुई। चाहे वह अच्छे स्कूल में पढ़ाई हो, या वीडियो गेम्स, आलीशान बर्थडे पार्टी हो या विदेश की सैर। बच्चों को बिना मांगे बहुत कुछ मिल रहा है और बिना चाहे मिल रहा है अंधाधुंध प्रतियोगिता, माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाएं और अपने आप को साबित करने का दबाव।

यही वजह है कि बाल मनोचिकित्सक डॉक्टर कहते हैं कि आजकल के माता-पिता और बच्चों के बीच का व्यवहार मुझे असामान्य सा लगता है। माता-पिता अपने बच्चे को सिर पर बिठा कर रखते हैं। यही बच्चे जब अपनी मनमानी करने लगते हैं, तो माता-पिता हमारे पास आते हैं अपनी समस्या लेकर।

आज के अभिभावक अपने समय में बिलकुल अलग जिंदगी जीते थे। संयुक्त परिवार में कई बच्चों की भीड़ में पलता था बच्चा। समय पर खाना मिल जाता था और डांट भी। मां की भूमिका मूलत: घर संभालने की ही होती थी। बच्चों की परवरिश में उनका दखल न के बराबर रहता था। उस समय के अधिकांश पिता अपने बच्चों के साथ एक दूरी बना कर चलते थे। घर में एक अनुशासन बना रहता था। बच्चे अपनी रोजमर्रा की दिक्कतें या उलझनें अपने दोस्तों या अपने हमउम्र बच्चों से बांटते थे।

माता-पिता और बच्चों के बीच एक अनकही सी दूरी आज के समय में एकदम मिट गई है। आज के दौर के माता-पिता अपने आपको बच्चों का दोस्त कहलवाना पसंद करते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे हर बात उनसे शेयर करें, उनके बीच किसी किस्म की दूरी न रहे।

बच्चों और माता-पिता के बीच दोस्ताना रिश्ते अगर एक दायरे में रहे, तो संबंधों में दरार नहीं आती। लेकिन ऐसा नहीं होता। बच्चे कब हद पार कर जाते हैं, इस बात का अभिभावकों को पता ही नहीं चलता।

बाल मनोचिकित्सक कहते हैं कि बच्चे का दोस्त बनने के लिए उनकी हर जिद पूरी करना जरूरी नहीं है। बल्कि शुरू से उन्हें सही मूल्य और संस्कार देना चाहिए। उन्हें तर्क के साथ बताएं कि बड़ों के साथ मार-पीट या डांट फटकार क्यों गलत है। बच्चों को सेंसिटिव बनाना स्कूल का नहीं, माता-पिता का दायित्व है। अगर शुरू से उन्हें पैसे से कोई चीज ले दे कर बहलाया जाएगा, तो मानवीय मूल्यों की इज्जत नहीं कर पाएंगे।

अब वह समय नहीं रहा कि बच्चे पढ़-लिख कर ठीक-ठाक नौकरी कर लें, तो माता-पिता को सुकून मिल जाता था। आज के दौर में हर तरफ गजब की प्रतियोगिता है। कई माता-पिता अपने बच्चों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करना चाहते हैं। नाच-गाना, पेंटिंग, अबाकस, खेल, स्विमिंग और दूसरे कई क्लासेस में जाने के बाद उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई के लिए ट्यूशन भी भेजा जाता है। जिन बच्चों पर जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं का बोझ होता है, वे बहुत जल्द मनोवैज्ञानिक दिक्कतों से घिर जाते हैं। बच्चों में डिप्रेशन अब आम बात हो गई है।

बच्चों को पूरा वक्त देना चाहिए। उस वक्त में हो सकता है आप सब साथ बैठ कर खाना खाएं, टीवी देखें या कुछ पढ़ें। क्वालिटी टाइम एक भ्रामक शब्द है। इसके नाम पर जरूरत से ज्यादा पैंपरिंग या लाड बच्चों को बिगाड़ता है। उनकी समझ विकसित नहीं होती। बच्चे के साथ कुछ समय मॉल में या पार्क में बिताने से एक-दूसरे के साथ भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाता।

यह सही है कि आज परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां रही नहीं। शिक्षित मांएं बच्चों की बेहतरीन परवरिश चाहती हैं। वहीं आधुनिक पिता की भूमिका भी ‘ब्रेड अर्नर’ से कहीं ज्यादा की है। वह बच्चों का फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड है। माता-पिता चाहते हैं कि घर के निर्णयों में भी बच्चों की भागीदारी हो।

हर दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते बदलते रहे हैं। हर दौर के अभिभावक मानते हैं कि वे अपने माता-पिता से बेहतर अपने बच्चों की परवरिश कर सकते हैं। अगर आज की पीढ़ी कम संवेदनशील है या उनके मूल्य बदल रहे हैं, तो कहीं न कहीं इसमें उनकी सोच से ज्यादा उनके अभिभावकों की सोच शामिल है।

परिवार की ऊर्जा और प्यार को बनाए रखने के लिए बाल मनोचिकित्सक द्वारा सुझाए गए कुछ टिप्स-

  • बच्चों को शुरू से सिखाएं कि ईमानदारी, सच्‍चाई, धैर्य और अनुशासन का कोई पर्याय नहीं। आप उनके सामने खुद उदाहरण बनें।
  • उनकी प्रशंसा का कोई अवसर ना चूकें। अगर बच्चा गलती करता है, तो उसे अकेले में फटकारें, दूसरे बच्चों के सामने नहीं।
  • उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं। उन्हें जीने की कला सिखाएं।
  • जानवरों से प्यार करना सिखाएं, इससे वे संवेदनशील होंगे।
  • बच्चों के दोस्त बनें, लेकिन हमेशा एक हलकी दूरी बनाए रखें। पति-पत्नी अपनी बातें उनसे ना शेअर करें।
  • बच्चों को अपनी बात कहने दें। हमेशा संवाद बनाए रखें।

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