हरियाली तीज पर पारम्परिक उल्लास और श्रद्धा भक्ति के साथ सुहागिनों ने रखा निर्जला व्रत

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में आज भादो मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज पारम्परिक उल्लास और श्रद्धा भक्ति के साथ मनायी जा रही है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए और कुंवारी लड़कियां योग्य वर-घर की मनोकामना के साथ दिनभर निर्जला व्रत रख रही हैं। सूर्यास्त के बाद सोलह श्रृंगार करके सुहागिनें गौरी-शिव शंकर और गणेश जी की उपासना करेंगी। पूजा और व्रत के सामान से बाज़ार सजे हुए हैं। महिलाएं खरीददारी करती और हाथों में मेंहदी लगवाती नज़र आ रही हैं।  

हरतालिका तीज व्रत का पौराणिक महत्व

हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। हिमालय पर गंगा नदी के तट पर माता पार्वती ने भूखे-प्यासे रहकर तपस्या की। माता पार्वती की यह स्थिति देखकप उनके पिता हिमालय बेहद दुखी हुए। एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए लेकिन जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो, वे विलाप करने लगी। एक सखी के पूछने पर उन्होंने बताया कि, वे भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही हैं।

इसके बाद अपनी सखी की सलाह पर माता पार्वती वन में चली गई और भगवान शिव की आराधना में लीन हो गई। इस दौरान भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की आराधना में मग्न होकर रात्रि जागरण किया। माता पार्वती के कठोर तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पार्वती जी की इच्छानुसार उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

तभी से अच्छे पति की कामना और पति की दीर्घायु के लिए कुंवारी कन्या और सौभाग्यवती स्त्रियां हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

 

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