बनने से पहले ही ना दरक जाये महागठबंधन, सभी दल कर रहे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी

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 पराग कुमार

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 के पास आते ही सभी राजनीति दल अपनी -अपनी रोटियां सेंकने की तैयारियों में जुट गये हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली भारतीय जनता जनता पार्टी ने कई विधान सभा चुनावों में भी शानदार जीत दर्ज कर विरोधियों के खेमे में यह भय पैदा कर दिया है कि कहीं उनका राजनीतिक अस्तित्व ही ना खतरे में पड़ जाये। इसीलिए आज सभी विपक्षी दल जो कभी एक दूसरे के धुर विरोधी हुआ करते थे, गठबंधन करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। लेकिन उनके वैचारिक मतभेद और वोट बैंक की राजनीति की प्रवृति कहीं महागठबंधन के इस किले को बनने से पहले ही ना ध्वस्त कर दे।

बात अगर राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की जाये तो उसकी नाव भंवर में गाेते लगा रही है। भाजपा के सरकार में आने से पहले कांग्रेस 20 से भी अधिक राज्यों में और केंद्र में सत्ता का सुख भाेग रही थी, संसद में उसका वर्चस्व हुआ करता था। लेकिन आज वह संसद के अंदर और संसद के बाहर कमजोर होती नज़र आ रही है और उसकी सबसे बड़ी वजह सरकार के खिलाफ मुद्दों की कमी और संसद में अपनी बात पुरजोर तरीके से न रख  पाना है। इसका ताज़ा उदाहरण अभी अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की हरकतें और गलत बयानबाजी पूरे देश ने देखी। कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी जिसने 60 साल देश पर राज किया, आज वह सत्ता पाने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ हाथ मिलाने में भी पीछे नहीं हट रही है। क्या यह उसके घटते जनादेश की ओर इशारा है।

बात अगर क्षेत्रीय दलों की जाये तो उनके लिए भी उनके ही क्षेत्रों में राजनीतिक संकट मंडरा रहा है। इसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल की साफ छवि और जनकल्याणकारी योजनाओं की सौगातें हो सकती हैं। इसलिए कांग्रेस समेत सभी क्षेत्रीय दलाें के पुराेधा भाजपा से सीधे टक्कर लेने के लिए महागठबंधन की बातें कर रहे हैं। कांग्रेस जिस राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात कर रही है, उनकी समझ बूझ उनके दिये भाषणों और बयानों में साफ दिखती है, जो उनकी अपरिपक्वता को दर्शाती है। शायद कांग्रेस के पास इससे अच्छा नेता नहीं है, जिससे काेई उम्मीद की जा सके। वैसे सारा कमाल गांधी सरनेम का है जिसके माेहपाश में कांग्रेस हमेशा फंसी नज़र आई है ।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने दलिताें के नाम पर राजनीति कर उनका शोषण किया और अपनी जेबें भरी। वह फिर से सरकार की नाकामी, किसानाें, महिलाओं और दलिताें के शोषण जैसे मुद्दाें काे लेकर अपनी शर्ताें पर कांग्रेस से हाथ मिला रही हैं। सीटों के बंटवारे उनकी इच्छा के अनुसार अगर ना हुए तो गठबंधन से अलग होने में शायद मायावती क्षण भर भी देर नहीं लगायेंगी। 

महागठबंधन के एक और पुराने धुरंधर हैं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, उनके अनुसार उन्हाेंने ही उत्तर प्रदेश में जनता की भलाई के लिए सारे कार्य किये हैं भाजपा ताे बस ढोंग करती है। यदुवंशियाें के विकास में उनका ही हाथ है। मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक के सफर के बाद वह भी प्रधानमंत्री बनने की रेस में हैं। लेकिन कहीं न कहीं पारिवारिक कलह के चलते वह भी हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं ।

इनके अलावा लालू की आरजेडी, आरएलडी, राकांपा, तृणमूल,आप और जनता दल ( एस) भी केवल अपने फायदे और भाजपा काे हराने के लिए ही हाथ मिला रहे हैं । इससे एक बात ताे साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता इतनी  है कि आज उन्हें हराने के लिए सब एक मंच पर आने को तत्पर हैं। 

अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। यह सुगबुगाहट तेज़ हो गयी है कि विपक्षी दल गठबंधन की बैसाखी का सहारा लेकर भाजपा काे हराने की इच्छा पाल रहे हैं। इन चुनावों और गठबंधन का कितना  असर लोकसभा चुनावाें में पड़ेगा, यह तो समय बतायेगा।

अचंभित करने वाली बात यह है कि जिस महागठबंधन की बात हाे रही है, उसमें सभी दल स्वंय को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेेदार समझ रहे हैं। आचार्य चाणक्य ने एक बात कही थी कि अगर आपके शत्रु आपके खिलाफ एकजुट हाे जाए ताे समझ लीजिए कि आप और अधिक शक्तिशाली हाे गए हैं तथा सही रास्ते पर चल रहे हैं । यह बात प्रधानमंत्री पर सटीक बैठती है। लेकिन आज समय की नज़ाकत को देखते हुए इस संभावित महागठबंधन के खिलाफ भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति को धार देने की भी जरूरत है। 

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