अपराधी बनते बच्चे, कहाँ हो रही है चूक…..   

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लख़नऊ। पहले प्रदयुम फिर ऋतिक और आगे अब न होगा अपने ही सीनियर के हाथों शिकार, इसका जवाब किसी के पास नहीं है और न ही कोई जानना चाहता है। क्या हो गया है आज हमारे नौनिहालों को न वो बड़ों का आदर करना जानते है और न ही अध्यापकों का सम्मान करना और न ही अपने से  छोटों के प्रति लगाव या प्यार करना। आखिर ये कौन सी पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसमे सिर्फ स्वार्थ, नफरत,  गुस्सा और नाराजगी भरी है। स्कूल में सीनियर जूनियर के बीच खींचतान  हमेशा से रहती है और वो जरूरी भी होती है जिससे जूनियर अपने  सीनियर को आदर सम्मान दें और इसके बदले में  सीनियर उनकी पढ़ाई या उससे सम्बन्धित कामों या समस्याओं में उनकी मदद करें, लेकिन आज बेवजह ही सीनियर अपने छोटे-छोटे जूनियर साथियों  के खून के प्यासे हो गए हैं।

ऐसे में जो सबसे जायदा डरे और सहमें हैं वो हैं बच्चों के अभिभावक, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है की वो अपने जिन बचचो को सुबह स्कूल भेज केर आ रहे हैं कब वह से कोई बुरी खबर न आ जाये उनके बचचो के बारे में। इसके साथ ही उन बचचो के माता-पिता भी चिंतित हैं जिनके बच्चे अपने ही  का सहपाठी  खून करने को आमादा हैं।

ऐसी घटनाएं रूकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। सहपाठी बच्चों के साथ स्कूल की प्रधानाचार्या को गोली मारने की घटना अभी हाल ही में ही हरियाणा में हुई, वहीं लखनऊ में एक स्कूल में बच्चों की आपसी लड़ाई इतनी बढ़ गई कि एक-दूसरे को लहूलुहान कर दिया। कम उम्र के लड़कों के द्वारा रेप और छेड़छाड़ की बढ़ी घटनाएं, ये हमें बच्चों की बदलती हुई मनोवृत्ति की ओर इशारा कर रही हैं। जिसकी हमें भनक तक नहीं हो रही है।

इन सबके पीछे अगर कारणों की पड़ताल की जाये तो कहीं ना कहीं बच्चों में नैतिक शिक्षा, संस्कारों की कमी और आदर्श के एक रूप की कमी है। घरों और स्कूलों में बच्चों से संवाद कम हो रहा है। मां-बाप पैसा कमाने, घर के कामों और मोबाइल में व्यस्त हैं, तो वहीं टीचर्स रटारटाया स्लेबस पूरा कराने और एक्टीविटी कराने में बिज़ी हैं।

दादा-दादी एकल परिवारों में अपनी जगह नहीं बना पा रहे है। जिनसे इन्हें मुफ्त में नैतिक शिक्षा मिल जाती थी। देशभक्ति के पाठ पुस्तकों में हैं लेकिन केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा मात्र हैं, देशभक्तों, स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन से प्रेरणा लेने की सीख उन्हें कौन सिखाये। ऐसे में अल्प विकसित मस्तिष्क में संस्कारों और आदर्शों के बीज कहां से बोये जाये, किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर कौन दे। संचार क्रांति के युग में अधकचरा ज्ञान मोबाइल बांट रहे हैं।

आज जरूरत है इस बात की कि बच्चों को अभिभावक और स्कूल दोनों पर्याप्त समय दें, उन्हें नैतिक शिक्षा के साथ समस-समय पर उचित मार्गदर्शन दिया जाये। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पढ़ेगा इंडिया तभी आगे बढ़ेगा इंडिया का नारा बुलंद करने के साथ ही शिक्षा के प्राथमिक स्तर को सुधारने और भारतीय संस्कृति, संस्कार के बीज बचपन से बच्चों में बोये जाने की आवश्यकता है।

 

 

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