हिंदी पत्रकारिता अख़बारों से डिजिटल युग की ओर…….

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हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष-

दीपाली सिंह। आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है । 30 मई 1826 को पं. युगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से पहले हिंदी अखबार उदंड मार्त्तण्ड का प्रकाशन शुरू किया था। तब से आज तक तमाम बदलावों के दौर को देखते हुए हिंदी पत्रकारिता 192 वर्ष पूरे कर चुकी है। अखबारों से शुरू हुई पत्रकारिता आज डिजिटल युग में पहुंच चुकी है। एक बड़ा लेखक और पाठक वर्ग यहां भी है पर लिखने और पढ़ने दोनों में बड़ा बदलाव आया है। साथ ही खबरों की दुनिया में बाजारवाद हावी हो गया है। पत्रकारिता सिर्फ लिखने वालों के लिए एक जरिया मात्र न रहकर हाई प्रोफाइल पेशा बन गया है, जहां हिंदी तो खूब फलफूल रही है, लेकिन किस दिशा में जा रही है यह पता नहीं। 

हर साल की तरह इस बार भी हिंदी पत्रकारिता दिवस पर बुद्धिजीवियाें, लेखकाें और पत्रकाराें काे एक मंच पर बुलाकर सामाजिक विषयों पर विभिन्न संगोष्ठियाँ, चर्चाएं आयोजित कर लेगें  और थाेड़ी बहुत पत्रकाराें के हिताें पर बातें भी हाे जाएंगी, पर क्या इससे हिंदी और पत्रकरिता का विकास संभव है। आज जो युवा वर्ग पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना करियर बनाने को उत्सुक है, वो उसकी ऊपरी चमक दमक से आकर्षित है, पत्रकारिता के बेस यानि लेखन, पठन और हिंदी भाषा के ज्ञान से कोसो दूर हैं।

रही सही कसर सोशल मीडिया पर यूट्यूब, ब्लॉग और फेस बुक ने पूरी कर दी है, इनकी बदौलत आज हर कोई पत्रकार बन गया है, जिसके मन में जो आ रहा है वो लिखे जा रहा है, ना तो भाषा का पता और ना तथ्यों का सही  से विशलेषण हो रहा है। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव युवाओं को संदेश देते हैं कि अगर लिखने में मज़ा आता हो, पढ़ना सुकून देता हो, तब ही इस क्षेत्र में आएं वरना उड़ने को आसमान बहुत बड़ा है।  

अखबारों के बिना जिन लोगों की सुबह नहीं होती थी वो आज दिन भर मोबाइल पर खबरिया वेबसाइट के नोटिफिकेशन से परेशान हैं। इधर कोई घटना हुई उधर समाचार चैनलों और वेबसाइट पर ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में उसे पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाने की होड़ मच जाती है। इस चक्कर में जो खबरें अगले दिन तक बनी रहती थी वो अब थोड़ी देर में ही बासी हो जाती हैं। समाचारों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगा है, जल्दी के चक्कर में तथ्यों का सही से आकंलन और विश्लेषण भी नहीं किया जाता है। 

फिलहाल व्यवसायीकरण के साथ प्रतिस्पर्धा के दौर में पहुंच चुकी हिंदी पत्रकारिता अपने उच्च शिखर पर विराजमान है और चुनौतियों से भरी है। ये बात और है कि पहले अखबारों से हिंदी के नये-नये शब्द सीखने वाले अब नहीं मिलते हैं। जल्दी में खबर पढ़ी और आगे बढ़ गये। अब तो समाचार चैनलों पर चर्चा के नाम पर नेताओं की बहस की लाइव कवरेज दिखाकर टीआरपी बढ़ाई जाती है। यहां हिंदी में उन शब्दों, भाषाओं का प्रयोग हो रहा है, जिसे देखना-सुनना शायद ही कोई हिंदी प्रेमी पसंद करे। 

पत्रकार वर्ग की बात करें तो आज के दौर में बहुत से पत्रकार चंद पैसाें के लालच में अपने आदर्शाें काे त्याग रहे हैं, ईमानदारी से समझौता कर रहे हैं और नेताअाें, मंत्रियाें की चापलूसी कर धन दाैलत यहां तक कि बड़ा पद प्राप्त करने की लालसा रखते हैं। उनके जीवन में उद्देश्य लिखने-पढ़ने से अधिक कैसे ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करें इस पर अधिक रहता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिंदी पत्रकारिता ने हमें बहुत कुछ दिया है, लेखक से आगे बढ़कर समाचार सम्पादक, समाचार संकलनकर्ता (संवाददाता), समाचार वाचक, कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ता, वाइस ओवर आर्टिस्ट, वीडियो-ऑडियो सम्पादक सहित विभिन्न क्षेत्रों में इसका विस्तार भी हुआ और हो भी क्यों ना, हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा जो है, जो दिलों को दिलों से जोड़ने में सक्षम है, बस जरूरत इस बात की है कि हम इसके मूल स्वरूप और गरिमा को बनाये रखे, जिससे हिंदी की आत्मा जीवित रहे।