Newsi7 special: सियासी पारा उफान पर, कर्नाटक के नाटक के बाद सबकी निगाहें कैराना और नूरपुर पर

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लखनऊ,पराग कुमार। मौसम के बढ़ते तापमान की तरह आजकल देश की राजनीति में चुनावी पारा भी चरम पर है। देश के किसी भी हिस्से में कैसा भी चुनाव, उपचुनाव हो राजनीतिक पार्टियों की वार राष्ट्रीय चैनलों और समाचार पत्रों के साथ सोशल मीडिया पर भी छायी रहती है। शायद इसकी बड़ी वजह 2019 में होने वाले लोकसभा का नजदीक आना है। चुनाव कोई भी हो उसे मीडिया में मोदी बनाम विरोधी गुटबाजी के रूप में पेश किया जा रहा है। जो भी हो इसका नफा-नुकसान मोदी और विपक्षी दलों दोनों को हो रहा है और लोकसभा चुनाव के ज़मीन तैयार होती दिख रही है।

अगर बात देश के सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी की करे, तो उसे आगे कदम फूंक-फूंक कर चलना है। हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनावाें में जाे हाल भारतीय जनता पार्टी का अपनी सरकार बनाने की जल्दबाजी के कारण हुआ, उसे फौरी तौर पर एक बड़ा झटका माना जा सकता है। कर्नाटक में अवसर का लाभ उठाते हुए कांग्रेस जेडीएस के साथ हाथ मिलाकर सरकार बनाने में सफल रही और सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी भाजपा विपक्ष में बैठेगी। 

इसी तरह उत्तर प्रदेश में भाजपा काे गोरखपुर तथा फूलपुर उपचुनाव में अपने ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की संसदीय सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा, जिसका बड़ा कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का मिलकर चुनाव लड़ना था। इन पराजयों से भाजपा काे सबक लेना चाहिए। एक बार फिर चुनाव सिर पर हैं, अबकी बार कैराना लोक सभा और नूरपुर विधानसभा सीटाें पर 28 मई को हाेने वाले उपचुनाव पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गये हैं।  सभी मुख्य विरोधी पार्टियां सपा, बसपा ,रालाेद और कांग्रेस भाजपा काे किसी भी कीमत पर मात देने के लिए एक हो रहे हैं । हमेशा एक दूसरे के खिलाफ मुंह खोलने वाले दल मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा वाला राग अलाप रहे हैं। इन विपक्षी दलाें काे लगता है कि आपस में लामबंद हाेकर और जनता काे भाजपा की नीतियाें की बुराई कर गुमराह करने से उनकी जीत आसान है लेकिन ऐसा करके कहीं न कहीं यह दल अपने पैराें पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और कमल काे ही मजबूत कर रहे हैं ।

28 मई को होने वाले उपचुनाव की बात करे तो एक ओर जहां कैराना में संवेदनशील मुद्दा जैसे एक वर्ग विशेष का पलायन उपचुनाव की धार काे और तेज कर रहा है ताे दूसरी तरफ मुज़फ्फरनगर दंगें और जिन्ना बनाम गन्ना चुनावी तपिश  को बढा़ रहा है। पक्ष और विपक्ष दाेनाें ही खेमे सबकाे अपने-अपने साथ करने में जी जान से लगे हुए हैं । ऐन वक्त पर लाेकदल प्रत्याशी कंवर हसन के विरोधी खेमे में जाने से मामला और राेचक हाे गया है ।

फिलहाल कैराना लोक सभा और नूरपुर विधान सभा के उपचुनाव में सभी दलाें खासकर सत्तारूढ़ सरकार भाजपा की साख दांव पर लगी हुई है। सभी की निगाहें कर्नाटक चुनाव के बाद अब इन उपचुनाव पर है, जनता प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला सोमवार को करेगी, चुनावी नतीजे 31 मई को घोषित किये जायेंगे। भाजपा को इन सीटाें पर जीत का परचम फहराना है, ताे जाटाें के वाेटाें काे अपने पक्ष में करना ही हाेगा और बुआ भतीजे की बेमेल जोड़ी काे हराना हाेगा। इन चुनावों के साथ मिशन-2019 का आगाज़  हाे गया है। भाजपा काे विरोधियों की अगली चाल पर नज़र रखने के साथ जनता के हित को सर्वोपरि रखते हुए बिना भेदभाव के विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए केंद्र में दोबारा सरकार बनाने का सपना देखना चाहिए।

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